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रघुवंशी समाज के रीति रिवाज व प्रथाये

लेखक-श्री राम कुमार रघुवंशी,सिलवानी

रघुवंशियो के रीति रिवाज व प्रथाये

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जब तक रघुवंशी अयोध्या मे रहते थे उनके रीति रिवाज एक जैसे थे।जब से रघुवंशी अयोध्या छोड़कर मप्र, महाराष्ट, गुजरात ,राजस्थान आये उन्होने उन स्थानो के अनुसार अपने रीति रिवाजो  मे परिवर्तन कर लिया । फिर भी रघुवंशियो के मूल रीति रिवाज लगभग एक जैसे है।

[5/30/2015, 1:33 PM] Rs Ramkumar: वैदिक काल मे रघुवंशी सोलह संस्कारो को मानते थे ।इन संस्कारो से ही रीति रिवाज उत्पन्न हुये है।हम मौर्यकाल से मुगलकाल तक तथा वर्तमान मे प्रचलित रीति रिवाजो व प्रथाओ की बात करेगे

1.पहला संस्कार-गर्भधारण संस्कार

2.दूसरा संस्कार -पुंसवन संस्कार

ये दोनो संस्कार वैदिक काल मे ही प्रचलित थे।


 

3.तीसरा संस्कार- सीमांतोनयन संस्कार-ये मोर्यकाल से मुगलकाल तक प्रचलित था।इसे आठवा पूजन के नाम से भी जाना जाता है।इसमे आठवे महीने मे गर्भवती स्त्री को श्रृंगार कराकर  कुर्सी या पलंग पर बैठाया जाता था ।तथा सौभाग्यवती स्त्रियां उसकी गोद भराई करती थी।इस अवसर पर स्त्रियाँ मांगलिक गीत गाती थी।वर्तमान मे ये प्रथा वंद होगयी है ।कुछ क्षेत्रो मे शायद अभी भी प्रचलित है।

4.चौथा संस्कार- जातकर्म संस्कार -इस संस्कार मे शिशु के जन्म के बाद नाल काटने से पहले पिता स्नान कर शिशु को घी शहद का मिश्रण चटाता है यदि पिता कही बाहर है या मूल लगे हो तो दादी या ताई वुआ चटाती है इसके बाद माँ का दूध पिलाया जाता है फिर नाल छेदन (नाल/नरा काटना) किया जाता है।नाल छेदन के वाद सूतक शुरू होती है जो 5/10 दिन तक मानी जाती है।

यह संस्कार मुगलकाल तक प्रचलित था अभी भी कुछ परिवारो मे नवजात शिशु को घी शहद को मिश्रण चटाया जाता है

 

जात कर्म (शिशु जन्म ) से जुड़े रीति रिवाज

1.सूतक- यह 5/10 दिन चलती है।इस समय पूजन पाठ आदि कार्य नही किये जाते है।तथा किसी के घर भी नही जाते है।दशवे दिन साफ सफाई करके पूजन करके शुद्धि की जाती है।

 

2.बधाये/बधाई गीत-शिशु के जन्म के बाद परिवार समाज की महिलाये इकट्ठी होकर मांगलिक गीत गाती है।इसे बधाई या बधाये कहा जाता है।बधाये या वधाई गीत शिशु की बुआ या दादी या मामी नानी आदि के द्वारा करवाये जाते है तथा वताशे वाँटे जाते है।न्योछावर वाटी जाती है ढोल वाजे वजबाये जाते है।

 

3.लड्डू -शिशु जन्म के वाद माँ के स्वास्थ की दृष्टि से पौष्टिक लड्डू बनवाये जाते है।तथा लड्डुओ को समाज व रिस्तेदारो मे बॅटवाया जाता है।इसके अलावा शिशु की माँ के मायके से भी लड्डू भेजे जाते है।

 

4.झूला/दोलारोहण-शिशु जन्म के बाद लड़के को 12 वे दिन लड़की को 13 वे या किसी शुभ नक्षत्र मे झूले पर झूलाया जाता है।मांगलिक गीत गाये जाते है।इस दिन से शिशु का झूला झूलना शुरु हो जाता है।झूला शिशु की वुआ द्वारा दिया जाता है।

5.जलमा पूजन या  कुआ पूजन- शिशु जन्म के एक महीने बाद जल पूजा की जाती है।इसमे शिशु की माँ परिवार व समाज की महिलाओ के साथ कुये पर जाती है तथा वहाँ जल पूजन की जाती है इसके बाद घड़े मे जल भरकर घडे को शिशु की माँ सिर पर रखकर घर लाती है घर पर देवर या भतीजा घड़े को उतारता है  बदले मे शिशु की माँ उसे नेग देती है।बधाई गीत गाये जाते है वताशे बाँटे जाते है।इसे जल पूजा या पनघट पूजा या कुआ पूजा या घाट पूजा कहा जाता है वर्तमान मे कुआ न होने की स्थिति मे यह पूजा हैण्डपंप या ट्यूवबेल पर की जाने लगी है।

 

कुप्रथाये या कुरीतिये

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1.पच कुप्रथा -शिशु जन्म के दशवे दिन के बाद शिशु की नानी मामी मामा आदि (मायके वाले) लड्डू लेकर आते थे साथ मे  धातु /चांदी/सोने के सूरज/चंदा/हाय जो  काले धागे मे गुथे होते थे शिशु के लिये लाते थे ।तथा माँ के लिये साड़ी लाते थे ।धीरे धीरे शिशु व माँ के लिये गहने तथा शिशु की माँ के  अलावा पूरे परिवार के लिये कपड़े दिये जाने लगे ।बाद मे इनके अलावा नगदी पैसा व अन्य सामान दिया जाने लगा। और इसे अनिवार्य कर दिया गया ।यदि कोई पिता इतना न करपाये तो उसे नीचा दिखाया जाने लगा।तथा शिशु की माँ को परेशान किया जाने लगा है। मायके वालो द्वारा लड्डू भेजने से शुरु हुयी यह प्रथा लड्डू से हटकर पच नाम से एक भयानक कुप्रथा के रूप मे प्रचलित हो गयी

2.गिफ्ट कुप्रथा-आज कल बच्चे के जन्म पर रिस्तेदार या मित्र या परिचितो द्वारा बच्चे के लिये कपड़े पैसे गिफ्ट देने की कुप्रथा चल पड़ी है।जिससे कमजोर लोगो पर व्यर्थ का आर्थिक भार पड़ रहा है।मजबूरी मे ये सब करना पड़ता है।

3. पार्टी प्रथा-आजकल बच्चे के जन्म पर पिता द्वारा पार्टी दिये जाने की प्रथा शुरु हो रही है जो आगे चलकर अनिवार्य हो जायेगी ।जिससे व्यक्ति पर व्यर्थ का भार पड़ेगा।

4.लड़का /लड़की मे  भेद करना- वैदिक काल पुत्री होना एक सौभाग्य माना जाता था परन्तु आज लड़का होने पर खुशियाँ मनाते है बडी बडी पार्टियाँ देते है और लड़की होने पर खुश नही होते।लड़के होना अनिवार्य मानते है।लड़की का नही।

हमे इन कुरीतियो को मिटाना है और इसकी शुरुआत हम स्वयं से व परिवार से करे।

5.पाँचवा संस्कार-नामकरण संस्कार-

बालक/बालिका व उसके माता पिता स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहन कर आसन पर बैठ कर पुजन करते है।फिर पुरोहित बालक या बालिका के जन्म के समय दिन तिथि नक्षत्र के अनुसार बच्चे की राशि व नाम का प्रथम अक्षर निकालते है।जिसके आधार पर बच्चे का नाम रखा जाता है।जिसे राशि का नाम कहते है ।इसके आलावा एक प्रचलित नाम भी रखा जाता है।इसमे परिवार के लोग उपस्थित होते है जो बच्चे को आर्शीवाद देते है।सभी को भोजन कराया जाता है।इसे चौका भी कहा जाता है।

वर्तमान मे यह प्रथा खत्म हो गयी है।केवल किसी विद्वान पंडित से जन्म कुण्डली बनवा ली जाती है

[6/4/2015, 9:53 PM] Rs Ramkumar: 6.छटवाँ संस्कार-निष्क्रमण संस्कार -बालक को पहली बार घर से बाहर निकालने के संस्कार को निष्क्रमण संस्कार कहते है।इसे बालक के जन्म के दूसरे या तीसरे महीने मे शुभ मुहुर्त मे निकाला जाता था।

यह संस्कार मुगलकाल तक प्रचलित था।वर्तमान मे कुछ घरो मे आज भी बालक को पहली बार शुभ मुहुर्त मे ही घपर से बाहर निकाला जाता है।

 

7.सातवाँ संस्कार – अन्न प्राशन संस्कार – प्रथम बार बालक/बालिका को अन्न खिलाने के लिये यह संस्कार किया जाता है।दाँत निकलने के बाद किसी शुभ नक्षत्र व मुहुर्त मे माता पिता पूजन कराते है।फिर बालक/बालिका को माँ की गोद मे बिठाकर पिता गौ दुग्ध मिश्री मे बनी चावल की खीर बच्चे को खिलाता है।

यह संस्कार आज भी कई परिवारो मे प्रचलित है।वर्तमान मे बच्चे का मामा खीर खिलाता है।

 

8. कर्ण वेध संस्कार -इस संस्कार मे किसी शुभ मुहुर्त मे पूजन कराकर बच्चे का कर्ण छेदा जाता था तथा  बच्चे को सोने /चाँदी/ताँबे की बाली पहनायी जाती थी।

यह संस्कार मुगलकाल तक प्रचलित था वर्तमान मे कुछ परिवारो मे बालक /बालिका दोनो के कर्ण छेद करबाये जाते है

 

9. चौल या मुण्डन संस्कार- बच्चे के जन्म के छः माह से पाँच वर्ष के बीच बालक/बालिका का मुण्डन करवाया जाता है ।

इसमे किसी शुभ नक्षत्र या तिथि को बच्चे को कुलदेवी या कुलदेवता या तीर्थ स्थान ले जाते है ।इसमे परिवार के सदस्य बच्चे की बुआ आदि इकट्ठे होते है।पूजन के बाद नाई उस्तरा से बच्चे का मुण्डन करता है

यह संस्कार सभी परिवारो मे होता है।

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